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Home Observation मेरी समझ मे बेहतर जीवन की रेसिपी आ ही गयी

मेरी समझ मे बेहतर जीवन की रेसिपी आ ही गयी

बहुत वर्षों पहले प्रोफेसर Anil Gupta जी ने एक बात कही थी के यदि आप financial capital कमाना चाहते हैं तो आपको पहले social capital कमानी चाहिये। आज एक ऐसे ही एंटरप्राइज से वास्ता पड़ा जिसके आगे तो दुकान है लेकिन पीछे से पियाऊ है। एक छोटी गुड़िया कोई 10 या 12 साल की इस सोशल एंटरप्राइज को चलाती है। सामाजिक कारणों से गुड़िया की फोटो नही खींची । लेकिन पियाऊ की फोटो जरूर खींच ली है। मैकडोनाल्ड या डोमिनोज पिज़्ज़ा की भी औकात नही है फ्री में पानी पिलाने की उनके बिजनेस मॉडल में स्कोप नही है। इन्वेंट्री कॉस्ट बढ़ जाएगी और अपना देहाती बिजनेस मॉडल अलग मान्यताओं और अवधारणाओं पर टिका है जिसे समझना हारवर्ड बिजनेस स्कूल के बस की बात भी नही है। 
बेहतर जीवन की इस रेसिपी के मात्र तीन ingredients हैं :
1. ईमानदारी
2. वफादारी
3. शराफत

इस रेसिपी के सहारे मन के तूफान शांत किए जा सकते हैं। लेकिन सवाल यह है के हमारी सोच(consideration) क्या है। हर इंसान को बेहतर जिंदगी के लिए 3L की आवश्यक्ता होती है Living, Loving and Learning अगर ये तीनो 33% प्रतिशत तक आपके जीवन मे हैं तो आप मुस्कुराइए, आप स्वर्ग में हैं। इन तीनो को बैलेंस करने के लिए हमे ईमानदारी, वफादारी और शराफत का ही सहारा मिल सकता है और कोई रास्ता दूसरा है ही नही। 


चरित्र निर्माण :
चरित्र निर्माण शाला जिसे समाज अपने आप चलाता है, यहां कोई भी पेड स्टाफ(Paid staff) नही है सब कुछ contribution से चलता है वो भी कोई माँगने नही जाता, समाज अपने आप देकर जाता है। इंसान अपने अंदर के इल्म और यकीन से चलता है, बाहर के डंडे से नही चलता।

Common Property Institutions :
ग्रामीण भारत मे परस्पर सहयोग और विश्वास जीवित है, शहरों में घर मे गेस्ट आ जाएं तो भी सेटिंग भिड़ानी पड़ती हैं यहां कोई जान पहचान नही और सीधे व्यवस्थाएं आपके हवाले कर दी जाती हैं। मतलब सांझी संपति, आधुनिक भारत मे इसका कोई कांसेप्ट नही है वहां आपको सब कुछ सर्विस मोड(Service Mode) में मिलेगा जिसका बिल आएगा । लेवता लोगों ने इस ताने बाने को बहुत नुकसान पहुंचाया है, मठनुमा मंदिरों और होटल में कोई खास फर्क नही होता। कॉमन प्रॉपर्टी इंस्टीट्यूशन्स हमारे बुजुर्गों ने बनाये और चला कर दिखाए। आधुनिक भारत जहां सेक्टर कल्चर है, सोसाइटी कल्चर है, उसमें भी ऐसा सोचा जाना चाहिए।

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