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आकर्षण के सिद्धान्त का महत्व

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आकर्षण का सिद्धांत

जिसकी पुनरुक्ति शक्ति बन जाये उसे ही मंत्र होता है। ऐसे ही जब विचारों की पुनरुक्ति होती ही तो वह आचरण बन जाता है। जिस विचार को बार बार दोहराएंगे वह जीवन मे प्रकट होना शुरू हो जाएगा। आप वर्तमान में जो भी हैं कुछ विचारों को बार बार दोहराने का परिणाम हैं। आधुनिक विज्ञान में सम्मोहन पर बहुत खोज हुई हैं। जिस भी विचार को वस्तु में रूपांतरित करना है उससे बार बार दोहराना ही सम्मोहन की प्रक्रिया पृष्ठभूमि है। दोहराने से एक रास्ता बन जाता है और मन उसी रास्ते से चलने लगता है। जैसे एक नदी बहती है और उसके पास गड्ढे बनाकर एक नहर निकाल दी जाती है। मनोवैज्ञानिक कहते है कि जब हम किसी बीमारी से ठीक होते हैं तो उसमें दवा का काम केवल 10 प्रतिशत होता 90 प्रतिशत तो मन का काम होता है विचारों की पुनरुक्ति का काम होता है। एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक मरीजों का इलाज करते थे। वो सिर्फ एक मंत्र दोहराने को बोलते थे कि मैं स्वस्थ हूँ। दिन में बहुत बार वो इस मंत्र को दोहराते और आश्चर्यजनक रूप से वो ठीक हो जाते।

कोई अच्छा डॉक्टर आपको कोई भी दवा दे आप ठीक हो जाओगे। क्योंकि आपको उस पर विश्वास हो जाता है कि अच्छा डॉक्टर है अब तो ठीक हो जाएंगे। आपने अक्सर देखा होगा कि जो सस्ता डॉक्टर है उसकी दवाई से उतना लाभ नही होता जितना महंगे डॉक्टर से होता है। ये विश्वास के कारण होता है विश्वास ही पुनरुक्ति है। वैज्ञानिकों ने ईलाज की नई तकनीक विकसित की जिसे प्लेसिबो प्रभाव (Placebo effect) कहते हैं। इसमें मरीज को एक झूठी दवाई दी जाती है जिसमे कुछ नही होता कोई साल्ट नही होता।और मरीज उसे खा कर भी ठीक हो जाता है। उसके शरीर पर भी वही प्रभाव होता है जो असली दवाई लेने से होता है। और यही कारण है कि जब किसी ने दवाई की खोज होती है तो उससे ज्यादा मरीज ठीक होते हैं क्योंकि उनको विश्वास होता है कि दवाई खोज ली गई है और अब सब ठीक हो जाएगा। समय के साथ साथ यह विश्वास कम होता जाता है और फिर इससे उतने मरीज ठीक नही होते जितने शुरुआत में होते थे।जिस दवा का विज्ञापन ज्यादा दिखाया जाता है वो ज्यादा कारगर होती है क्योंकि उसका विज्ञापन हमें संमोहित कर लेता है और बार बार हमारे विचारों में आने से वह स्थाई हो जाता है और जब भी हम बीमार होते है तो हम उसी दवा को लेते हैं। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हमारे विचारों की पुनरावृत्ति(Repetition) का हमारे शरीर पर कितना प्रभाव पड़ता है।


किसी भी क्रिया को बार बार दोहराने से वह स्थाई हो जाती है और फिर उससे छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि लगातार कई वर्षों से जो लोग बीड़ी या सिगरेट पीते हैं वो उसे आसानी से नही छोड़ सकते। बार बार दोहराने से आदत गहरी हो गई है जिससे बाहर निकलना आसान नहीं है। ऐसी आदत को छोड़ने के लिए कोई ऐसा काम करना होगा जो इसके बिल्कुल विपरीत हो।इस विपरीत काम बार बार दोहरा कर उस आदत से छुटकारा पाया जा सकता है क्योंकि बार बार दोहराने से ये भी आदत बन जाएगी। उदाहरण के लिए मान लो आपको सिगरेट पीने की आदत है। दिन में आप दो पैकेट पी जाते हो। और तभी कोई ऐसी व्यवस्था की जाए कि आपके सिगरेट हाथ मे लेते ही आपको Electric shock दे तो आप सिगरेट नही पी पाओगे। बार बार आपका मन करेगा फेर Electric shock लगने से आपको दर्द होगा और आप सिगरेट नही पी पाओगे। इस प्रयोग को 10 दिन दोहराने के बाद आप सिगरेट नहीं पियोगे। क्योंकि ये दर्द आपकी सिगरेट पीने की आदत से ज्यादा शक्तिशाली है। इसलिए आपका मन सिगरेट की और नही जाएगा। किसी भी आदत को छोड़ने के लिए उसके विपरीत आदत डालनी होगी जो उससे ज्यादा मजबूत हो । इसके अलावा आदत को छोड़ना बहुत मुश्किल है।

हमारा जो जीवन आज है वह हमारे मन का और उसमें आए विचारों का ही परिणाम है जिन्हें हम लगातार दोहराते रहते हैं। जो को हम जीवन मे दोहराते हैं वही बार बार हमारे सामने आता है। जो भी हमारे जीवन मे गलत है उसे छोड़ने की जल्दी नही करनी है बल्कि जो अच्छा है या गलत के विपरीत है उसे अपनाना है। नकारात्मक (Negative) विचारों को नही दोहराना है क्योंकि उसके नकारात्मक परिणाम होते हैं जो दुख का कारण बनते हैं। कभी भी ये नहीं सोचना की में इस बीमारी से मुक्त हो जाऊं बल्कि स्वस्थ शरीर के बारे में सोचना। यह भाव दोहराना की में स्वस्थ हो रहा हूं। अगर हमे सिरदर्द है हमे ये नही कहना है कि मेरे सिर में दर्द है। क्योंकि इससे नकारात्मक शब्द प्रभाव में आता है, हमे यह भी नही कहना है कि सिर में दर्द नही है क्योंकि इसमे भी दर्द का जिक्र है।हमे इस भाव रखना है में स्वस्थ हूँ। जो गलत है बार बार उसे नही दोहराना है क्योंकि दोहराने से वह मजबूत होता है, इसकी बजाय जो सही है उसकी और ध्यान लगाना है।

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