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Home Poetry ये करवटे भी यूँ बेवजह नहीं

ये करवटे भी यूँ बेवजह नहीं

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सुनों ! ये करवटें भी यूँ बेवजह नहीं हैं…

कुछ तो है दिल में….

जो अब तक कहा नहीं है…

ये करवटें भी यूँ बेवजह नहीं हैं |

फिर उनसे दूर जाने के बाद…

पल पल मन ही मन उनसे ही बाते करना भी बेवजह नहीं है |

कभी लगता सब कुछ बेवजह ही है…

लेकिन किसी के जीने की वजह बनना भी तो बेवजह नहीं

पर हाँ, किसी के जीने की वजह बनकर…

उनसे उनके जीने की वजह छीन लेना भी तो ठीक नहीं |

पता है जब मन भारी होता है न तो दो चीज़ें बहुत भारी हो जाती हैं

हाँ, सिर और आँखें तो भारी होती ही हैं |

साथ ही जो भारी हो जाता है वो है तकिया और वो सिलवटों वाली चादर भी…

उसको लाइट (हल्का) रखो और अपनी नींद को लाइट रखो

ताकि ज़िन्दगी ब्राइट बन सके |

ठीक है ???

ठीक है !

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