“सम्मान दो और सम्मान लो” क्या ये सच है? – नहीं, ये पूरी तरह सच नहीं है।
यह वाक्य बहुत लोकप्रिय है और ज्यादातर लोग इसे जीवन का एक अच्छा नियम मानते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो यह आधा सच है — और कई बार यह हमें गलत उम्मीद में बाँध देता है।
सम्मान क्या है?
सम्मान यानी लोगों को बिना कुछ कहे पूरी तरह मान लेना। चाहे वे कुछ भी करें, हमें लगे कि ये गलत है, फिर भी उन्हें जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लें। किसी पर जजमेंट न करें (खुद पर भी नहीं), कोई दोष न दें, कंट्रोल न करें और आलोचना न करें।
जब हम कहते हैं, “लोगों को जैसा है वैसा स्वीकार करो”, तो मन में ये सवाल आता है, “तो क्या उन्हें बुरा काम करने दूं? क्या सलाह, सुझाव या गाइड न करूं?”
नहीं! मतलब सिर्फ ये समझना कि हर कोई अलग है, सबकी अपनी सोच और चुनाव है। व्यक्ति को उसके काम से अलग रखें।
सम्मान वो तस्वीर है जो मैं किसी के बारे में बनाती हूं। ये उस व्यक्ति पर नहीं, बल्कि मेरी अपनी सोच की शुद्धता पर टिकी है।
अगर मैं शुद्ध, प्यार भरी, पॉजिटिव और निष्पक्ष हूं, तो सबकी अच्छी तस्वीर बनाऊंगी। लेकिन अगर मैं नेगेटिविटी में हूं, तो सबकी बुरी तस्वीर बनाऊंगी। तो सम्मान सिर्फ मेरी सोच पर निर्भर है, किसी ओर पर नहीं!
सम्मान हमारी अंदर की बात है। हम एक-दूसरे के बारे में क्या सोचते हैं, वो अलग चीज है।
उदाहरण:
- चौकीदार सलाम कर सकता है, लेकिन मन में सोच सकता है, “ये पागल आदमी कौन है?”
- सहकर्मी कह सकता है, “गुड मॉर्निंग, आपसे मिलकर अच्छा लगा”, लेकिन सोच सकता है, “शैतान आ गया!” क्या ये सम्मान है? नहीं!
“सम्मान” वो तस्वीर है जो मैं किसी के बारे में बनाती हूं। ये उस व्यक्ति पर नहीं, बल्कि मेरी अपनी सोच की शुद्धता पर टिकी है।
अगर मैं शुद्ध, प्यार भरी, पॉजिटिव और निष्पक्ष हूं, तो सबकी अच्छी तस्वीर बनाऊंगी। लेकिन अगर नेगेटिविटी में हूं, तो सबकी बुरी तस्वीर बनाऊंगी। तो सम्मान सिर्फ मेरी सोच पर निर्भर है, किसी ओर पर नहीं!
हमने सुना है, “सम्मान दो, सम्मान लो।” क्या ये सही है? नहीं! सम्मान, प्यार, भरोसा सब एक तरफा है। जैसे ही दूसरों से उम्मीद करने लगोगे, सब खो देते हैं। सब भावनाएं हम खुद बनाते हैं।
हम अपना व्यवहार दूसरों पर इतना टिकाए हैं कि अपना व्यक्तित्व ही खो दिया। उन्हें अपनी भावनाओं का दोष देते हैं:
- अगर वो कुछ अलग बर्ताव करे, तो गुस्सा।
- धोखा दे, तो करियर बर्बाद।
- अपमान करे, तो बदला।
Bla! Bla! Bla! Bla! Bla! Bla!
Example:
शिक्षकों का सम्मान: मैं उनकी तारीफ करती हूं, सब बातें मानती हूं, भरोसा रखती हूं। कभी जज नहीं करती। अगर उनका काम मेरी “सही” सोच से अलग हो, तो उनकी नजर से समझती हूं और सहानुभूति रखती हूं।
बच्चों का सम्मान: मैं उनसे सम्मान की उम्मीद करती हूं, लेकिन पहले बच्चों के लिए खुद सम्मान दिखाऊंगी। माता-पिता को बच्चों को व्यक्ति की तरह ही स्वीकार करना चाहिए।
उदाहरण – शादी से पहले: लड़का-लड़की समय बिताते हैं, पसंद-नापसंद जानते हैं।
- एक-दूसरे को जैसा हैं वैसा मानते हैं (जज नहीं करते)।
- भावनाएं समझते हैं।
- एक-दूसरे की राय का सम्मान करते हैं, कभी-कभी एक दूसरे की राय को अपनाते भी हैं। लेकिन यह जरुरी नहीं कि वे दोनों हमेशा एक-दूसरे से सहमत हों।
- अच्छा सोचते हैं, खुश करते हैं, माफी मांगते हैं।
- बहुत वैल्यू देते हैं। यहां स्वीकार ज्यादा, उम्मीद कम।
शादी के बाद: दोनों की सोच में फर्क तो होगा ही। जैसे – अगर पति को गुलाबी रंग बुरा लगे, और पत्नी उसको पहने और पति चिढ़े, बदलने को कहे – तो ये बुरा है! जज करना और बदलने की कोशिश, मतलब अस्वीकार। अस्वीकार = अनादर। रिश्ते में अनादर अच्छा नहीं।
अनादर के संकेत:
- आप इतने कन्फ्यूज क्यों है?
- आप गलत है, पता नहीं?
- आप ऐसे क्यों कपड़े पहनते/बोलते/खाते हो?
- आप मुझे परेशान कर रहे हो!
- आप चालाक/आलसी है…
- आप कभी नहीं समझते/सुनते…
ध्यान रखें: कभी व्यक्ति को टारगेट न करें। हम सब अंदर से शुद्ध और अच्छे हैं। दुनिया सुंदर इसलिए है क्योंकि सब अलग हैं – सोच, राय, चुनाव, स्किल्स। बस इसे मान लें। लोग गलती करेंगे। उन्हें सशक्त बनाएं, पॉजिटिव फीडबैक दें। कर्ता का सम्मान करें, काम का नहीं!
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क्या डर = सम्मान? नहीं! डर नेगेटिव है, नफरत पैदा करता है। डर से प्यार नहीं होता। “भगवान से डरो” ये बिल्कुल गलत है। सम्मान करना एक पॉजिटिव बात है, इससे रिश्ता जुड़ता है।
बच्चे और ‘डर vs सम्मान’:
- डर से: सजा के डर से मानेंगे।
- सम्मान से: समझेंगे क्यों मानना है, प्यार से करेंगे। जानेंगे हम उनकी केयर करते हैं।
आप कौन सा चुनेंगे?
सम्मान की उम्मीद सही है? जितना हम देते हैं, उतना लौटेगा। हमें अंदर की अच्छाई के लिए सम्मान मिलना चाहिए, बाहर की चीजों (पद, स्टाइल, पढ़ाई) के लिए नहीं।
अगर मैं सब स्वीकार कर लूं (परिणाम चाहे जो हो), तो उम्मीद कर सकती हूं। उम्मीद रखो, लेकिन परिणाम मान लो।
उदाहरण – बच्चे के मार्क्स: 95% की उम्मीद। उसे प्रोत्साहित करो: “तुम 95% लाओगे, आसान है!” लेकिन अगर कहो “लाना ही है”, तो वह दबाव है। बच्चा सोचेगा, “न लाया तो मम्मी-पापा दुखी होंगे!”
भगवान हमें सिखाते हैं: भगवान हमें सिखाते हैं कि वे हमारे लिए सब कुछ हैं – मां, बाप, दोस्त, और ब्रह्मांड के मालिक 💫। वे हमें बिना शर्त प्यार करते हैं, हमारी गलतियों के बावजूद हमें स्वीकार करते हैं, और हमारी केयर करते हैं। हम जैसा हैं वैसा मानते हैं। हमारे हर एक अच्छे-बुरे काम के बावजूद प्यार करते हैं, केयर करते हैं।
वे हमारा सम्मान करते हैं, हम उनके बच्चे हैं – तो हमें भी एक-दूसरे के प्रति ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए, है ना? 😊 तो हम क्यों न करें?





