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आदत से मुक्ति

कभी कभी हम बहुत खुश हो जाते हैं और कभी कभी बहुत निराश हो जाते हैं , ऐसा होना स्वाभाविक है | किसी के जरा सा उकसा देने पर ही हम गुस्से से भर जाते हैं | जब नियमित रूप से ऐसा होने लगता है तो यह आदत बन जाती है और इस तरह हम एक मशीन की तरह काम करने लगते हैं जिसका मतलब यह हुआ कि हमारा रिमोट कंट्रोल किसी ओर के पास है | कोई अगर गाली दे तो गुस्सा आ जाएगा और कोई तारीफ़ कर दे तो खुश हो जायंगे | इस तरह हम एक रिमोट कण्ट्रोल यंत्र बन जाते हैं जिसका नियंत्रण किसी और के हाथ में है | लेकिन हम मशीन नहीं हैं हम इंसान हैं और इंसान होने का इतना सा मतलब है कि आप अपने मालिक खुद हो , मालकियत तुम्हारे पास है| जब हम स्वंय कुछ करते हैं तो वह क्रिया होती है जिसमे हम खुद मालिक होते हैं | लेकिन जब किसी के उत्तर में हम कुछ करते हैं या कहते हैं तो वह प्रतिक्रिया होती जिसमे हम मालिक नहीं होते बल्कि कोई और मालिक होता है, जिसके प्रतिउत्तर में हम कुछ करते हैं |

आदत क्या है ?

आदत को अंग्रेजी में ‘Habit’ कहते हैं जोकि लैटिन शब्द ‘Habitus’से बना है जिसका अर्थ है ” प्राप्त करना”| जब व्यक्ति किसी काम को अपनी इच्छा से बार बार करता है तब वह काम कुछ समय बाद बिना प्रयास के अपने आप होने लगता है , तो उसे आदत कहते हैं | मनोवैज्ञानिकों के अनुसार “आदत मनुष्य का दूसरा स्वभाव” है | सभी प्रतिदिन कुछ न कुछ काम करते हैं , कुछ न कुछ सोचते हैं | यही काम और विचार जब नियमित रूप से होने लगते हैं तो आदत बन जाते हैं| आदत का मतलब है किसी काम का हमारे अवचेतन मन द्वारा स्वत: किया जाना| नियमित रूप से होने वाले काम हमारे मन में स्थाई हो जाते हैं और हमारा दिमाग और शरीर उसको अपने आप करने लगते हैं । उदाहरण के तौर पर जब हम कार चलाना सीखते हैं तो उसका अभ्यास करते हैं | शुरूआत में बहुत ध्यान से कार चलाते हैं लेकिन कुछ समय बाद धीरे धीरे हमे उसकी आदत हो जाती है और हमारा दिमाग और शरीर खुद कार चलाने लगते हैं | आदतों का हमारे जीवन में बहुत महत्व है | आदतों के बिना हमारा जीवन असंभव है| अगर आदतें नहीं होगी तो हमे कुछ भी करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा और संभव है कि हम किसी काम को दोबारा न का सकें | आदत मनुष्य का व्यवहार है जो बिना अधिक सोच के बार बार दोहराया जाये, धूम्रपान एक आदत का उदाहरण है |

आदत अच्छी या बुरी ?

आमतौर पर हम मानते हैं कि आदतें दो प्रकार की होती हैं, अच्छी आदत और बुरी आदत | हम अच्छी आदत उन्हें मानते हैं जो हमे अच्छी लगती हैं और उनसे हमें सहूलियत होती है | बुरी आदत हम उन्हें मानते हैं जो समाज को अच्छी नहीं लगती और जिनके नतीजे अच्छे नहीं होते | ज्यादातर लोग मानते हैं कि हमे बुरी आदत छोड़ देनी चाहिए और अच्छी आदत का पालन करना चाहिए | लेकिन मैं मानता हूँ कि आदत दोनों ही छोड़ देनी चाहिए | आदत एक बंधन है और हम उसमे बंध जाते हैं । मेरा मानना है कि आदत छोड़ देनी चाहिए ,अच्छी या बुरी से फर्क नहीं पड़ता , क्योंकि पिंजरा लोहे का हो या सोने का फर्क नहीं पड़ता पिंजरा पिंजरा होता है | ये बात आपको हजम नहीं होगी जोकि स्वाभाविक है क्योंकि हम बचपन से यही सुनते आ रहे हैं कि अच्छी आदतें अपनानी चाहिए।

चलो इसके बारे में थोड़ा विस्तार से बात करते हैं | एक व्यक्ति को सिगरेट पीने कि आदत है और एक आदमी को माला फेरने कि आदत है | दोनों नियमित रूप से अपनी आदतों का पालन करते हैं | पहले को अगर सिगरेट न मिले तो बेचैनी होने लगती है और कुछ अच्छा नहीं लगता और दूसरा अगर एक दिन माला न फेरे तो उसे सब अधुरा सा लगता है| इन दोनों स्थितियों में कर्ता बंधा हुआ है| आमतौर पर हमे लगता है कि सिगरेट पीना गलत आदत है और माला फेरना अच्छी आदत है | बुनियादी रूप से दोनों में ज्यादा फर्क नहीं है | असली सवाल आदत से मुक्त होने का है | मेरा ये मानना नहीं है कि माला नहीं फेरनी चाहिए या सिगरेट पीना अच्छी बात है, मैं इन सब के दुसरे पहलु कि बात कर रहा हूँ | मैं चाहता हूँ कि आप खुद के मालिक बने रहो | कोई भी आदत आपको गुलाम न बना ले | कोई भी आदत अच्छी या बुरी, आपकी मालिक न बन जाये , फिर चाहे वो माला फेरने की आदत हो या धुम्रपान करने की| स्वामित्व बचाकर आदतों का प्रयोग करना ही सबसे अच्छा रास्ता है|

निष्कर्ष

अगर हमारा स्वामित्व ही खो गया और हम आदतों के वशीभूत होकर जिए जा रहे हैं तो हमारे जीवन का कोई प्रयोजन नहीं बचता , तब हम एक बेहोश या मृत व्यक्ति के समान हैं | एक धुम्रपान करने वाले व्यक्ति को धुम्रपान करने से कुछ प्राप्त नहीं होता है , लेकिन अगर वो ऐसा न करे तो उसे बैचैनी होती है | सोचने कि बात है कि जिस चीज के करने से कुछ प्राप्त नहीं तो उसे न करने से नुकसान कैसे हो सकता है | आदत यही सब तो करती है , पाने को कुछ नहीं और छोड़ने पर मुसीबत का एहसास होता है | यह हमारी आदत / स्वभाव होता है कि पुरानी लकीरों पर न चलने पर हमे असहज अनुभव होता है| आदत मालिक बन जाये तो सब आदतें बुरी हैं |

प्रतिपल आदतें बन रही हैं | आदते जीवन में बहुत जरूरी हैं आदतों के बिना जीवन मुश्किल है | बस इतना सा ध्यान रखना है कि आदत मालिक न बन जाये | इस संसार में खुद को गंवा कर हासिल करने जैसा कुछ भी नहीं है | बुद्ध ने इसे होश कहा है | जो भी करो होशपूर्वक करो | उठना, बैठना, खाना पीना सब होशपूर्वक बेहोशी में कुछ मत करना | इतना स्वामित्व रहना चाहिए खुद पर कि अगर किसी आदत को छोड़ना चाहो किसी आदत को तो इसी पल छोड़ दो दोबारा सोचने कि जरूरत ही न पड़े |

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