आज के बच्चों को देख कर यह समझ में आता है कि मौजूदा दौर में जो बच्चे अभी नर्सरी, पहली, दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ रहे हैं वो जन्मजात ही MBA हैं। क्या आपने ये नोटिस किया है कि बच्चे खेल ही खेल में कितने व्यवस्थित तौर तरीके अपनाते हुए दिखाई देते हैं । मैं जब भी बच्चों से मिलती हूँ तो वो एकदम व्यवस्थित तरीके से सोचते हुए दिखाई पड़ते हैं।
अभी मैं यह समझ नहीं पा रही हूँ कि यह कितना ठीक है या कितना गलत है।
लेकिन यह बात पक्की है कि दुनिया में कहीं परमात्मा या किसी सुप्रीम पॉवर का बनाया नॉलेज सेंटर जरुर है जिससे प्रकृति का हर एक जीव कनेक्ट रहता है और प्रकृति सभी का ज्ञान वहां स्टोर करके रखती है और सभी में बांटती रहती है |
आज के बच्चों को देखकर दिल बाग-बाग हो जाता है। जो बच्चे अभी नर्सरी, केजी, पहली, दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ रहे हैं, वो जन्म से ही MBA लगते हैं! हाँ, बिल्कुल सही सुना आपने – खेल-खेल में ही ये बच्चे इतने व्यवस्थित, इतने सिस्टेमेटिक तरीके अपनाते हैं कि बड़े-बड़े मैनेजर भी शरमा जाएँ।
मैं जब भी बच्चों से मिलती हूँ, हैरान रह जाती हूँ। ब्लॉक्स का टावर बनाना हो तो एक बच्चा आधार बनाता है, दूसरा सामान लाता है, तीसरा डिज़ाइन सोचता है और चौथा “टाइम लिमिट” भी तय कर देता है! प्रेटेंड प्ले में चाय पार्टी हो तो सीटिंग अरेंजमेंट, मेहमानों की लिस्ट, मेन्यू और यहाँ तक कि “प्लीज़ थैंक यू” का पूरा प्रोटोकॉल खुद-ब-खुद तैयार हो जाता है। खेल के बीच नियम बदलते हैं, झगड़ा सुलझाते हैं, रिसोर्सेज़ (यानी खिलौने) का बँटवारा करते हैं – सब कुछ इतनी ख़ूबसूरती और व्यवस्था से कि लगता है कोई मिनी कॉर्पोरेट ऑफिस चल रहा हो।
अब सवाल ये उठता है कि ये सब इतना परफेक्ट कैसे हो रहा है? यह कितना सही है और कितना गलत – ये मैं अभी तक समझ नहीं पा रही हूँ। एक तरफ़ बहुत अच्छा लगता है कि बच्चे इतनी छोटी उम्र में लाइफ स्किल्स – टाइम मैनेजमेंट, टीमवर्क, नेगोशिएशन, प्रॉब्लम सॉल्विंग, लीडरशिप – सब सीख रहे हैं। दूसरी तरफ़ डर भी लगता है कि कहीं हम बचपन से ही इन पर प्रेशर तो नहीं डाल रहे? कहीं इनकी मासूमियत, बची भी है या नहीं?
फिर भी एक बात बिल्कुल पक्की है… इस ब्रह्मांड में कहीं न कहीं परमात्मा या किसी सुप्रीम पॉवर का एक बहुत बड़ा “नॉलेज सेंटर” ज़रूर मौजूद है। प्रकृति उस सेंटर से जुड़ी हुई है और हर जीव – चाहे चींटी हो, पक्षी हो, जानवर हो या इंसान – उससे कनेक्टेड रहता है। हर अनुभव, हर ज्ञान, हर स्किल वहाँ स्टोर होती है और ज़रूरत पड़ने पर प्रकृति उसे सबमें बाँटती रहती है।
शायद यही वजह है कि आज का बच्चा बिना पढ़े-लिखे इतना व्यवस्थित सोचता है। शायद उसका दिमाग अभी इतना साफ़ और खाली है कि वो सीधे उस यूनिवर्सल नॉलेज सेंटर से डाउनलोड कर लेता है। हम बड़े तो बीच में बहुत सारी फालतू फाइल्स डाल देते हैं, इसलिए कनेक्शन कमज़ोर पड़ जाता है 😊
तो चलिए, इन छोटे-छोटे MBA को हम और प्रेशराइज़ करने की बजाय उनकी इस ख़ूबसूरत स्किल को सेलिब्रेट करें। उन्हें खेलने खेलने दें, लीड करने दें, गलतियाँ करने दें और सीखने दें। क्योंकि सचमुच ये बच्चे “रेडी फॉर लाइफ” पैदा हो रहे हैं – और हमें उनसे बहुत कुछ सीखना बाकी है।
आपके आसपास के बच्चों में भी ऐसा कुछ नज़र आता है? कमेंट में ज़रूर बताइएगा ♡
✒️ लिखित भावनाओं से (आपकी अपनी – जो बच्चों को देखकर हर बार हैरान हो जाती है)
