Skip to content
The way to live life

वक्त से रूबरू जब हुए हम, जीने का तरीका सीख गए हम।

वक्त से रूबरू जब हुए हम, जीने का तरीका सीख गए हम… बिती बातों पर अब सवाल नहीं करती, वक्त किमती है बहुत , अब मैं इसे बर्बाद नहीं करती… वक्त जो कहता है, वही… वक्त से रूबरू जब हुए हम, जीने का तरीका सीख गए हम।

My journey from inside to outside

“मैं” के अंदर से “बाहर” तक का सफ़र…..

बहुत धूमिल सी अब मुझमें मैं रह गयी हूँ…
शून्य सी जैसे अम्बर में कहीं खो गयी हूँI
यकीन हो चला है यही शून्य जीवन है…
ना कभी कुछ मेरा था ना कुछ आज मेरा है…
ना कोई गुमान बाक़ी है ना कोई मान बाक़ी हैI
अनंत तक जाने में… खो जाने में…
“मैं” के अंदर से बाहर तक का सफ़र…

तुम क्या मिटाना चाहते हो ?

तुम क्या मिटाना चाहते हो ? एक सवाल है तुम लोगो से ये बताओ तुम क्या मिटाना चाहते हो? हर खिलते हुए फूल को यूँ मसल देना ठीक है क्या? किसी के बेटे किसी के… तुम क्या मिटाना चाहते हो ?

तो क्या हुआ !

तो क्या हुआ !एक बार फिर से… दिल ही तो “दुखा” है | तो क्या हुआचाहे अब कोई अपना ही रूठा है | तो क्या हुआरती भर हैं खुशियाँ और पहाड़ जैसे हैं ग़म |… तो क्या हुआ !

Thank You My Dear

Thank You, Thank You So much To came into my Life… You came and You did well… I needed you… You have made me happy… Extremely happy…Thank You… Thank you for being my best friend…… Thank You My Dear

डोर है ज़िन्दगी… खींचा-तानी तो चलती रहेंगी….

यहाँ हकीकत का तेज़ मांझा है तो…. ख्वाहिशों की उड़ान भरने वाली पतंग भी | डोर जैसी है ये ज़िन्दगी… तो खींचा-तानी तो चलती रहेगी | ज़िन्दगी की कलम पर नहीं है अब ऐतबार मुझे… डोर है ज़िन्दगी… खींचा-तानी तो चलती रहेंगी….

ये करवटे भी यूँ बेवजह नहीं

सुनों ! ये करवटें भी यूँ बेवजह नहीं हैं… कुछ तो है दिल में…. जो अब तक कहा नहीं है… ये करवटें भी यूँ बेवजह नहीं हैं | फिर उनसे दूर जाने के बाद… पल… ये करवटे भी यूँ बेवजह नहीं

अब क्या करना…

कोई ग़ज़ल सुना कर क्या करना, यूँ बात बढ़ा कर क्या करना | चाहे अब कुछ हुआ भी हो, तो अब दुनिया को बता कर क्या करना, तुम साथ निभाओ चाहत से, कोई रस्म निभा… अब क्या करना…

क्या लिखूं : तुम्हें लिखूं या न लिखूं

क्या लिखूं तुम्हें ??? मैं समझ नहीं पा रही हूँ क्या लिखूं ??? आपकी वो अच्छी बातें लिखूं या वो बेवजह गुस्सा करना ??? या जो कहना है वो लिखूं ??? फिर सोचती हूँ ….… क्या लिखूं : तुम्हें लिखूं या न लिखूं

“अपनी संस्कृति का ही पालन करो ना, मुझसे जरा भी मत डरो ना” – करोना

राम युग में दूध मिलाऔर कृष्ण युग में घीकोरोना युग में काढा मिलेडिस्टेंस बना कर पी जब दुनिया लेके बैठी हैबड़े-बड़े परमाणुपर ठोक गया सबको एकछोटा सा विषाणु कल रात सपने मेंआया कोरोनाउसे देख जो… “अपनी संस्कृति का ही पालन करो ना, मुझसे जरा भी मत डरो ना” – करोना

ये ग़म क्या दिल की आदत है? नहीं तो

एक पुरानी कविता को कुछ अलग शब्दों में दर्शाने की छोटी सी एक कोशिश :- ये ग़म क्या दिल की आदत है? नहीं तोकिसी से कुछ शिकायत है? नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे ताबीर… ये ग़म क्या दिल की आदत है? नहीं तो